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Shardiya Navratri 2020: भृगु ऋषि चले गए तब लक्ष्मी ने विष्णु को उन्हें दण्डित करने को कहा. जब विष्णु ने ऐसा नहीं किया तो लक्ष्मी कोल्हापुर चली गईं…

शारदीय नवरात्रि २०२० (Shardiya Navratri 2020): नवरात्रि (Navratri) के 9 दिनों में माता के 9 रूपों की पूजा की जाती है. आज 17 अक्टूबर को नवरात्रि (Navratri) का पहला दिन है है.नवरात्रि में माता की पूजा-अर्चना और व्रत की मान्यता काफी होती है. देश भर में शारदीय नवरात्रि (Navratri) को काफी धूम-धाम से मनाया जाता है. नवरात्रि (Navratri) के समय श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए माता के चरणों में शीश झुकाते हैं. नवरात्रि (Navratri) के दिनों में माहौल भक्तिमय रहता है. माता के अलग-अलग शक्तिपीठ में भक्त अपनी मनोकामना लेकर जाते हैं. माता के 51 शक्तिपीठ माने जाते हैं जिनमें 9 शक्तिपीठ प्रमुख हैं. इन 9 शक्तिपीठ में से कोल्हापुर श्री महालक्ष्मी मन्दिर के बारे में यहां बताया गया है.

श्री महालक्ष्मी मन्दिर, कोल्हापुर
पुरानों में उल्लेखित शक्तिपीठों में से एक श्री महालक्ष्मी मन्दिर को भी माना गया है. कहा जाता है कि यहाँ आकर सच्चे मन से मन्नत मांगने वाले भक्तों को कभी निराश नहीं होना पड़ता. 700 ईस्वी में कन्नड़ के चालुक्य साम्राज्य में इस मन्दिर का निर्माण हुआ था. माना जाता है कि भगवान विष्णु के साथ महालक्ष्मी इस मन्दिर में निवास करती हैं. मन्दिर में महालक्ष्मी की 3 फीट की मूर्ति काले रंग की है और दीवार पर श्रीयंत्र खोदकर बनाया हुआ है. माना जाता है कि मार्च और सितम्बर महीने की 21 तारीख के आस-पास सूर्य खुद महालक्ष्मी के चरणों को प्रणाम करता है. कहा जाता है कि भृगु ऋषि जब विष्णु से मिलने के लिए गए तब वह सो रहे थे और ध्यान नहीं दिया. ऋषि ने उन्हें छाती पर पैर मारकर जगाया. इसके बाद विष्णु ने उन्हें माफ़ी मांगते हुए कहा कि कहीं आपको चोट तो नहीं आई. ऋषि चले गए तब लक्ष्मी ने विष्णु को उन्हें दण्डित करने को कहा. जब विष्णु ने ऐसा नहीं किया तो लक्ष्मी कोल्हापुर चली गईं.

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शक्तिपीठ की कहानी और पौराणिक मान्यता
51 शक्तिपीठों में से कोल्हापुर भी एक शक्तिपीठ है और जब माता सती ने यग्न कुण्ड में आत्मदाह कर लिया तब महादेव दुखी हुए और सती के पार्थिव शरीर को अपनी भुजाओं में लेकर तांडव प्रारम्भ कर दिया. उनके क्रोध के सामने संसार भस्म होने लगा और किसी के पास भी उन्हें रोकने का कोई उपाय नहीं था. इस पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के शरीर को 51 भागों में बाँट दिया और सभी टुकड़े अलग-अलग जगह जाकर गिरे. जिन जगहों पर माता के शरीर के टुकड़े पत्थर के रूप में स्थापित हुए, उन्हें शक्तिपीठ माना गया. कोल्हापुर मन्दिर में माता सती का त्रिनेत्र गिरा था और नवरात्रि के समय यहाँ 9 दिनों तक पूजा होती है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता दुर्गा ने रजा यक्ष प्रजापति के घर सती के रूप में जन्म लिया था. आत्मदाह के बाद अगले जन्म में सती ने ही पार्वती के रूप में जन्म लिया और भगवन शिव को फिर उन्होंने प्राप्त कर लिया. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं मान्यताओं पर आधारित हैं.

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