कोरोना के बीच मंदिर खोले जाने से होते हुए महाराष्ट्र में विवाद सेकुलर (controversy over secular word in Maharashtra) शब्द के इर्द-गिर्द आ गया है. अब इसे लेकर राज्य के मुख्यमंत्री और राज्यपाल आमने-सामने हैं.

महाराष्ट्र में मंदिरों के खोले जाने को लेकर वहां के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (Bhagat Singh Koshyari) और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के बीच ठन गई. असल में राज्यपाल ने ठाकरे पर तंज कसते हुए उन्हें सेकुलर कह दिया. इसके बाद से दोनों के बीच जो बहस चल रही है, सो तो है लेकिन सेकुलर शब्द एक बार फिर चर्चा में है. जानिए, आखिर क्या है ये शब्द जो आए-दिन इस्तेमाल होता है.

कहां से आया ये शब्द 
सेकुलर शब्द काफी पुराना है. ये लेटिन भाषा के saeculum से बना है, जिसका मोटा-मोटी अर्थ है- किसी भी धर्म के प्रति तटस्थ रहने वाला. यानी जो सही मायने में सेकुलर होते हैं कि वे किसी भी धर्म विशेष के लिए झुकाव या रंजिश नहीं रखते. वैसे लेटिन में इसका मूल अर्थ अनंत और सार्थक जीवन से है. क्रिश्चियन धर्म में इसे ईश्वर से जोड़ा जाता है जो समय के बाद भी रहते हैं.

धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसके लिए तटस्थ

यही इस तरह से देखें तो सेकुलर यानी वो कतई नहीं है जो भगवान के होने से इनकार करता है. कई विशेषज्ञों और दार्शनिकों ने इसपर सहमति जताई कि सेकुलर यानी एंटी-रिलिजियस नहीं, बल्कि रिलीजियसली-न्यूट्रल होना है. यानी धर्म के विरोध की बजाए किसी भी धर्म के लिए उदासीनता.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे

पश्चिम से आया है सेकुलर
वैसे सेकुलर शब्द को पश्चिम और क्रिश्चियनिटी से आया शब्द मानते हैं. यही वजह है कि दूसरे धर्मों में इसके लिए अलग से कोई शब्द नहीं है, बल्कि इसे ही शामिल कर लिया गया. अब इस शब्द का सबसे ज्यादा उपयोग राजनीति में किया जा रहा है. इसके अलावा हायर स्टडीज में भी इस शब्द का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है, जहां सेकुलर ट्रेंड से लेकर सेकुलर पैटर्न और सेकुलर हेल्थ तक शब्द शामिल हैं.

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पहले भी हुआ है विवाद
भारतीय राजनीति पर गौर करें तो सेकुलर शब्द को लेकर अक्सर पार्टियां आमने-सामने आती रही हैं. ये पहला मौका नहीं है जब महाराष्ट्र में इसे लेकर घमासान मचा. इससे पहले भी भारतीय संविधान से इसे हटाने की बात आ चुकी है. बता दें कि वाजपेयी सरकार ने भी साल 1998 में संविधान की समीक्षा के लिए कमेटी बनाई थी. तब इसका विरोध भी हुआ था कि ये संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित करने की कोशिश है. साथ ही ये भी कहा गया था कि ये वास्तव में सेकुलरिज्म और आरक्षण को खत्म करने के लिए किया जा रहा है.

नहीं हो सका बदलाव 
हालांकि ये शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना में होने के कारण इससे छेड़छाड़ नहीं हो सकी. असल में संसद के पास संविधान को संशोधित करने की शक्ति तो है, लेकिन तभी तक, जब तक कि संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर को न बदला गया हो.

संविधान का मूल मसौदा तैयार करने के दौरान भी इस शब्द पर काफी बवाल हुआ

संविधान बनाने के दौरान हुई थी बहस
देश में संविधान का मूल मसौदा तैयार करने के दौरान भी इस शब्द पर काफी बवाल हुआ था. अधिकतर नेता इस शब्द को जोड़े जाने के खिलाफ थे. खुद संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर को भी सेकुलर शब्द के जोड़े जाने से एतराज था. कई नेताओं ने बहस के दौरान तर्क किया कि सेकुलर कहते हुए हम ये मान लें कि धर्म की हमारे जीवन में कोई जगह नहीं. या फिर कई धर्मों के कारण हमें चुनाव में तकलीफ हो रही हैं या फिर सेकुलर शब्द को शामिल किया जाए तो संविधान में धर्म से जुड़े सारे मूल अधिकारों को गायब कर दिया जाए. आखिरकार संविधान निर्माण के दौरान सेकुलर शब्द गायब रहा.
  
दोबारा जोड़ा गया सेकुलर शब्द
साल 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एकाएक ऑल इंडिया रेडियो पर इमरजेंसी का एलान किया. साल 1976 में इमरजेंसी के दौरान ही संविधान की प्रस्तावना में संशोधन किया गया, जिसमें ‘सेक्युलर’ शब्द को शामिल किया गया. इस पर एक पक्ष का मानना है कि संविधान में इससे पहले भी पंथ निरपेक्षता का भाव शामिल था. प्रस्तावना में सभी नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता और समानता का अधिकार दिए गए हैं. 42वें संशोधन में सेलुकर शब्द को जोड़कर सिर्फ इसे स्पष्ट किया गया था.

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